इतिहास में पतंग की अलग अलग भूमिका

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    प्रतिकात्मक तस्वीर

    1) 1750
    पतंग की शुरुआत 1750 में बड़े पैमाने पर हुई थी उस समय राजा महाराजा और नवाब लोग शोक के लिए पतंग उड़ाया करते थे पतंग को प्रोत्साहन देने के लिए शहंशाह शाहआलम और वाजिद अली ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी अवध के नवाब वाजिद अली को उस समय कैंसर जैसी बड़ी बीमारी थी तब उन्हें हकीम ने आकाश की तरफ ध्यान केंद्रित करने के लिए और स्वासोस्वास लेने के साथ प्रकृति के साथ समय व्यतीत करने की सलाह दी थी जिससे वाजिद अली के सलाहकारों ने उन्हें पतंग उड़ाने की सलाह दी थी

    2) 1752
    बिजली बनाने के लिए अभ्यास और प्रयोगों में पतंग का योगदान रहा है 1752 में अमेरिका के फिलाडेल्फिया में पतंग की सहायता से वातावरण में बिजली बनाने के लिए प्रयोग किए गए थे इस प्रयोग में फेकिंलन के बेटे ने बरसात के समय सिल्क की डोरी से पतंग उड़ाई थी पतंग गीली ना हो उसके लिए सावधानी रखी गई थी

    3) 1857
    1857 मैं सुधारक करसन दास जी मुंबई से डीसा जा रहे थे तब सूरत में रुके थे वह दिन उत्तरायण का था उन्होंने देखा कि औरतें छपरे पर चढ़कर कटी हुई पतंग पकड़ रही है यह दृश्य देखकर करसनदास स्तब्ध हो गए क्योंकि उन्होंने मुंबई में तो उस समय सिर्फ बच्चों को ही पतंग उड़ाते हुए देखा था कभी गलती से कोई 20 वर्ष का व्यक्ति पतंग उड़ाए तो सब उसका मजाक बनाते थे और यहां लड़की झांखर लेकर पतंग पकड़ रही है यह देख कर करसनदास नाराज हो गए पतंग के लिए लड़ाई करने वाले लोगों की उन्होंने निंदा की उत्तरायण के दूसरे दिन पत्थर मारी करते हुए लोग भी उन्होंने देखे थे

    4) 1903
    राइट भाइयों ने 1903 की 17 दिसंबर को पहला विमान उड़ाया था हालांकि उससे पहले सालों तक लोगों ने आकाश में उड़ाने के लिए केवल मात्र प्रयोग किए थे विमान उड़ाने के प्रयास में पतंग का योगदान रहा है वह 1900 मैं राइट भाइयों ने पतंग की तरह ही ग्लाइडर उड़ाया था जिसका आकार शुरुआत के विमान जैसा ही था इस ग्लाइडर को उन्होंने पतंग की तरह ही उड़ाया था

    5) 1927
    राजधानी दिल्ली में हर साल स्वतंत्रता दिवस पर पतंग उड़ाई जाती है इसके पीछे भी एक इतिहास है पतंगों पर संदेश लिखकर पतंग उड़ा कर जागृती फैलाने के रिवाज बहुत ही पुराने है आजादी के पहले से ही यह परंपरा चली आ रही है सन 1927 में साइमन कमीशन जब भारत आए थे तब उसके विरोध में लोगों ने पतंग के ऊपर गो बैक लिखकर पतंग उड़ाई थी उसके बाद अनेक प्रकार के संदेश लिख कर पतंग उड़ाई गई हैं आज के समय में भी यह परंपरा चली आ रही है और स्वतंत्रता दिवस पर पाटननगर में आकाश में उड़ती पतंग दिखाई देती है खासकर के दिल्ली के इंडिया गेट पर 15 अगस्त के दिन लोग पतंग उड़ाने आते हैं केवल दिल्ली ही नहीं उत्तर भारत में भी आजादी के दिन पतंग उड़ाने की पुरानी परंपरा चली आ रही है

    6) 1938
    1938 में सूरत के हीरालाल कपड़िया ने पतंग पुराण नाम से एक किताब लिखी थी जिसमें पतंग का आकार उड़ाने की रीत डोरी बनाने की रीत बताई है उस समय 10 पैसे में बिकने वाला पतंग पुराण आज बहुत ही अनोखी बन गई है 1938 में 38 प्रकार की पतंग सूरत में मिलती थी जिस मैं अडीपटेदार, अस्त्रेदार, आंखदार, आदासीसी, खरबूज , चांददार, चोशल, पानदार, प्यालेदार, बाजीदार जैसी अन्य पतंगे बेची जाती थी

    7) 1948
    अंतरिक्ष यात्रियों ने मनुष्य को स्पेस में कैसे ले जाएं यह खोज की थी पर स्पेस मैं से धरती पर वापस कैसे सुरक्षित लाएं यह खोज करनी अभी बाकी थी सन 1948 में फ्रांसिस रोगालो नाम के वैज्ञानिक ने आकाश में से खुद वापस घूम जाए ऐसी पतंग बनाई थी उनकी खोज के आधार पर नासा के वैज्ञानिकों ने स्पेस में से अंतरिक्ष यात्री को धरती पर ला सके उसके लिए कैप्सूल बनाएं

    8) 1934-2008
    आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 1934 के इंडिया एयरक्राफ्ट एक्ट मैं पतंग को विमान माना जाता हे और कायदेसर पतंग उड़ाने के लिए दी विमान उड़ाने की तरह मंजूरी लेनी पड़ती है इतना ही नहीं इस कलम के अनुसार लापरवाह से पतंग उड़ाने पर जेल की सजा हो सकती है इस कायदे के अनुसार यंत्र के मशीन जो हवा में स्थित रहे अथवा तो वातावरण में स्थिर रहे उसे विमान माना जाता है जैसे कि गुब्बारा एयरक्राफ्ट पतंग ग्लाइडर्स और फ्लाइंग मशीन का भी समावेश किया जाता है आगे इस कायदे को भंग करने पर 6 महीने की कैद और ₹10000 जुर्माना होता है पर 2008 में इस कार्य में सुधार किया गया जिसमें 2 वर्ष जेल और सजा की रकम ₹1000000 कर दी गई जबकि इस कायदे अनुसार कभी भी किसी भी पतंगबाज को सजा नहीं की गई है.

    जर्नलिज्म स्टूडेंट: हीना मन्सूरी

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